अवसाद और शिव संकल्प
- लेखक
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प्रीति शर्मा
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- संकेत शब्द:
- Mental Resolve
- सार
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"मन के हारे हार है, मन के जीते जीत, मन ही मिलावत राम सौं मन ही करत फजीत ।।" हमारे दुख सुख हमारे मन पर निर्भर करते है यदि मन पर हमारा नियंत्रण हो तो हम बड़े से बड़ा दुख मुस्कुराकर सहन कर जाते है। हमारे मन की दृढ़ता हमसे कुछ भी करवा सकती है यदि हम हार का अनुभव करेंगें तो निश्चित ही हारेंगें । यदि हम जीत का अनुभव करते है तो हमारे जीतने के अवसर बढ़ जाऐंगें । हमारे मानसिक संकल्प ही हमें दृढ़ता के साथ जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कराने में सहायक सिद्ध होते हैं। यदि कोई मनुष्य अपने मन में ही अपने आप को हीन व समस्या के सामने हारा हुआ निश्चित कर लेता है तो उस व्यक्ति को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में कोई भी जीता नहीं सकता है। मानसिक संकल्प की हीनता कमी के चलते व्यक्ति अवसाद का शिकार हो जाता है। उसका लक्ष्य से ध्यान विचलित हो जाता है। मनुष्य के विचारों का परिणाम उसके कार्य के माध्यम से यथार्थ स्वरूप को प्राप्त करता है। अतः यह आवश्यक है कि वह अवसाद जो कि एक क्षणिक उदासी या निराशा की भावना से कहीं अधिक है उससे बाहर आए क्योंकि यह अवसाद मनुष्य को उसकी सामान्य गतिविधियों से भी दूर कर मृत प्रायः जीवन बना देता है। अवसाद मानसिक रुग्णता है जो धीरे - धीरे शारीरिक क्षमता को नष्ट कर डालती है। इस अक्षमता से दूर रहने का उपाय है सत्साहित्य, सत्संगति, उत्साही लोग और उत्साह से परिपूर्ण जीवनशैली को अपनाना । हमारी सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों का आंकलन करते हुए हमारे समग्र व्यक्तित्व के परिमार्जन हेतु हमारी आर्ष परम्परा ने हमें अनुपम साधना पद्धति प्रदान की है जिसका अनुसरण हमें हमारे जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होता है। वेद उद्घोष करता है “अहमिन्द्रो' न पराजिग्ये' यह संकल्प ही हमें उत्साह सम्पन्न बनाता है। अस्तु हम देखते है। एक शुभ संकल्प एक शिव संकल्प हमारे जीवन को श्रेष्ठता की ओर ले जाता है। अवसाद को हमारा संकल्प प्रसाद में परिवर्तित कर देता है। हमारे वेदों में वर्णित षडमंत्रात्मक सूक्त तो इसका प्रबलतम उदाहरण है जो मन की शक्ति के माध्यम से जगत को परिचित करवाता है। चूंकि शक्तिहीनता अवसाद है और संकल्पयुक्तता प्रसाद देती है । विजयी बनाती है, कल्याण की ओर प्रवृत्त करती है। अतः हमें हमारे मन को शिव संकल्प का अधिकारी बनाकर प्रसन्नता को सदैव आत्मसात् करना है।
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- प्रकाशित
- 2025-10-31
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How to Cite
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- डॉ. वीना चौबे, कला, लोककला और समाज का अंतरसंबंध , ART ORBIT: खंड 1 No. 03 (2025): ART ORBIT ISSN 3107-670X
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