राजस्थान के संग्रहालयों में प्रदर्शित माटीशिल्प की समृद्ध परम्परा का समकालीन कला पर प्रभाव
- लेखक
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Dr. Laxman Lal Sargada
श्री गुरु गोविंद राजकीय महाविद्यालय##default.groups.name.author##
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- संकेत शब्द:
- माटीशिल्प, सांस्कृतिक धरोहर, समकालीन कला, संग्रहालय, मूर्तिकला, लोक संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण
- सार
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राजस्थान की माटीशिल्प परंपरा भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण अंग है, जो उपयोगिता, सौंदर्य और लोकजीवन की अभिव्यक्ति का माध्यम रही है। कालीबंगा और आहाड़ जैसे पुरातात्त्विक स्थलों से प्राप्त मृद्भाण्ड, मूर्तियाँ और मिट्टी के खिलौने इस कला की प्राचीनता और विकसित स्वरूप को दर्शाते हैं। राजस्थान के संग्रहालय—जैसे बीकानेर राजकीय संग्रहालय, अल्बर्ट हॉल संग्रहालय और कालीबंगा संग्रहालय—इन कलाकृतियों को संरक्षित कर कलाकारों और शोधकर्ताओं को प्रेरणा प्रदान करते हैं। समकालीन कलाकार पारंपरिक टेराकोटा कला से प्रेरित होकर आधुनिक मूर्तिकला, चित्रकला, डिजाइन और सजावटी कलाओं में नए प्रयोग कर रहे हैं। माटीशिल्प का प्रभाव फैशन, ग्राफिक और इंटीरियर डिजाइन में भी दिखाई देता है। यह कला पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण आज के समय में और अधिक प्रासंगिक बन गई है। वैश्विक स्तर पर भी राजस्थान की टेराकोटा कला भारतीय लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर रही है। हालांकि औद्योगिकीकरण, मशीन निर्मित वस्तुओं और घटती कारीगर संख्या जैसी चुनौतियाँ मौजूद हैं, फिर भी संरक्षण और प्रोत्साहन के माध्यम से इस परंपरा को भविष्य में और सशक्त बनाया जा सकता है।
- प्रकाशित
- 2026-01-31
- खंड
- Articles
- License
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How to Cite
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- Dr. Laxman Lal Sargada, जूना महल, डूंगरपुर की चित्रकला: शृंगार, सौंदर्य और दर्शन का अद्वितीय संगम , ART ORBIT: खंड 2 No. 1 (2026): ART ORBIT ISSN 3107-670X
